हिंदी की अखिल भारतीय पहचान बनाने में आजादी के आंदोलन का जितना हाथ रहा है, हिंदी सिनेमा का उससे कम नहीं। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों से हिंदी भाषी क्षेत्रों में मुख्यधारा सिनेमा की उपस्थिति को भोजपुरी फिल्मोंकी तरफ से चुनौती मिली है। इसकेसाथ ही मनोरंजन केबाजार में अन्य बोलियां भी घुसपैठ कर अपनी जगह बना रही हैं। बोलियों और फिल्म के संबंध पर प्रकाश डाल रहे हैं- लाल बहादुर ओझा
केबल टीवी, वीडियो पार्लर की चुनौती केलिए मुख्यधारा सिनेमा ने अपनी तोड़ निकाल ली। अब मल्टीप्लेक्स और ओवरसीज सिनेमा का बाजार खुला था। अमिताभ के बाद शाहरूख, आमिर, सलमान, ऋतिक आदि ग्लोबल चेहरे और भाव-भंगिमा वाले अभिनेताओं केसाथ ऐसी फिल्मों का बाजार बना जिनका रिश्ता यहां के कस्बों और गांव के लोगों के साथ नहीं था
ऐसा नहीं है कि भोजपुरी में संगीत, गीत और नाटक की परंपरा नहीं रही है। आखिर भिखारी ठाकुर, तुलसी, कबीर की जमीन वही है। वहीं से मोती बीए, बिस्मिल्लाह खान, अनजान और समीर आते हैं। उसी जमीन से महेंद्र मिसिर और पंडित छन्नूलाल मिसिर आते हैं। लेकिन, यह सच है कि संगीत केअलावा बाकी अनुशासनों की कोई जमीन नहीं रही। इस इलाके से आने वाले कवियों, लेखकों का इस सिनेमा से कोई लगाव नहीं है
हिंदी राष्ट्रभाषा बने इस कोशिश में क्षेत्रीय बोलियों के प्रिंट साहित्य का बहुत विकास नहीं हुआ, लेकिन तकनीक केविकास के साथ-साथ ऑडियो-वीडियो दोनों माध्यमों में बोलियों का कद बढा है।
कभी एक सिनेकार ने कल्पना की थी कि कैमरे का इस्तेमाल कलम की तरह होना चाहिए। अब तकनीक ने इतना विकास कर लिया है कि लगभग कैमरे का उपयोग इस तरह से होने लगा है। मोबाइल कैमरे से फिल्म का निर्माण और उसके लिए प्रतियोगिता-पुरस्कार लगभग इस स्थिति की तसदीक करता है। तकनीक जनसुलभ हुई और जनता की परिकल्पनाओं को जगह मिलनी भी शुरू हुई है। तथाकथित बोलियों का सिनेमाई माध्यम में छलांग इसी विकास की अभिव्यक्ति है, लेकिन तकनीक की जनसुलभता एक तरह की भेडचाल भी शुरू करती है, इसीलिए नए जोश में यह देखना आवश्यक होगा कि पांव जमीन पर पड़ रहे हैं या नहीं।
वर्ष 2003 के बाद भोजपुरी सिनेमा का जो ज्वार मीडिया में उमड़ा था, वह थोड़ा शिथिल पड़ा है। अलबत्ता पहले गीत, फिर सिनेमा के उठान और भोजपुरी चैनलों केआने की खबर चहुंओर थी। लेकिन जितनी तेजी से चर्चा हुई गीतों, सिनेमा और चैनलों के आ जाने केबाद उसके कंटेंट का खोखलापन स्पष्ट हो गया है। और यह बात की जाने लगी है कि सिर्फ बड़े बाजार के कारण न तो भाषा आगे बढ़ती है और न ही उसके दूसरे कलारूप।
1962 में ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो’ केसाथ भोजपुरी सिनेमा एक ताजा झोंके की तरह आया था। तब मुख्यधारा सिनेमा भी कोई बड़ा तीर नहीं मार रहा था। हां, सत्यजीत राय, विमल रॉय और ऋत्विक घटक जैसे लोग बांग्ला सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय ऊंचाई दे रहे थे, लेकिन हिंदी में अभी भी सामाजिक-पारिवारिक फिल्मों का जोर था। बढिया गीत-संगीत भर से बात बन जाया करती थी। ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो’ इन्हीं तत्वों से बुनी गई थी और जब परदे पर चढ़ी तो गांव-गली में उसके गीत गुलजार हुए। इसी कड़ी में ‘बिदेसिया’, ‘लागी नाही छूटे राम’ जैसी कुछ और भी फिल्में आईं और कमोबेश अच्छा प्रभाव छोड़कर गईं। भोजपुरी गीतों का बाजार पहले से ही बना हुआ था और उनकी जगह हिंदी सिनेमा में खास तौर से थी। अब यह साबित हो गया था कि इस भाषा में कहानी कही और बेची जा सकती है।
सत्तर की मंदी के दौर में हिंदी फिल्मों केलिए ही पैसों के लाले पड़े थे। रंगीन फिल्में बन रही थीं और उनमें नई तरह की महंगी तकनीक का इस्तेमाल शुरू हो गया था। भोजपुरी में हाथ आजमाने वालों केलिए उस बजट पर दांव लगाना जोखिम का काम था। इस स्थिति ने पहली उठान पर थोड़े दिनों तक लगाम लगा दिया।
गीत-संगीत और सामाजिक फिल्मों के दौर केसाथ ही मुख्यधारा सिनेमा में डाकू फिल्मों का दौर आया। इनमें डाकुओं को केंद्र में रखकर कहानियां बुनीं और गढ़ी जा रही थीं। रोमांच, स्टंट, मारधाड़ के मसाले के साथ इन फिल्मों ने बड़े दर्शक समुदाय को अपनी ओर आकर्षित किया। ‘शोले’ इस शृंखला की सुपर-डुपर फिल्म थी। 60 के दशक की सफल फिल्म ‘बिदेसिया’ की कहानी को ही थोड़ी आड़ी-तिरछी कर मिस इंडिया प्रेमा नारायण का तडक़ा लगाकर भोजपुरी फिल्म एक बार फिर परदे पर आईं। ‘दंगल’ नामकी इस फिल्म में अच्छे ठुमके थे। इसी फिल्म का एक गाना ‘आरा हीले छपरा हीले’ भोजपुरी अंचल में काफी लोकप्रिय हुआ। ‘दंगल’ चल गई तो फिर एक बार भोजपुरी बाजार में जान आई। कुछ ही समय बाद भोजपुरी-अवधी पृष्ठभूमि में ‘कोहबर की शर्त’ नामक उपन्यास पर आधारित हिंदी फिल्म ‘नदिया के पार’ आई। बड़जात्या परिवार के राजश्री प्रोडक्शन के बैनर तले बनी इस फिल्म ने कई रिकार्ड ध्वस्त किए और फिल्म ‘गंगा जमुना’ की तरह इसमें भी निर्माताओं में भरोसा जगाया कि भोजपुरी-अवधी अंचल में काफी संभावना है।
हालांकि कोई बड़ा बैनर फिर भी भोजपुरी फिल्मों में पैसे लगाने को तैयार नहीं था। छोटे उद्योग धंधों में लगे भोजपुरी अंचल के लोगों में हिम्मत हुई कि वे इस सिनेमा में पैसा लगाएं। ‘गंगा किनारे मोरा गांव’, ‘भइया दूज’, तो इतनी लोकप्रिय हुई कि उसे राजस्थानी में डब किया गया और वहां भी उसे अपार सफलता मिली, परंतु इस दौर की फिल्मों में वह दम नहीं था जो शुरूआती दौर की फिल्मों में था। मुख्यधाराकी फिल्में भोजपुरी से मीलों आगे थीं। पहले दूरदूर्शन, फिर केबल टीवी और उसके बाद वीडियो पार्लर के बूम इस सिनेमा केव्यवसाय केलिए कई बाधा बनकर उभरे। मुंबई सिनेमा फिर एक बार इस दबाव में लड़खड़ाने लगा था। मुख्य रूप से मुंबई सिनेमा कामकाजी लोगों केपैसे की बचत पर आश्रित भोजपुरी सिनेमा इस दूसरी उठान केबाद लगभग शून्य की स्थिति में पहुंचा।
केबल टीवी, वीडियो पार्लर की चुनौती केलिए मुख्यधारा सिनेमा ने अपनी तोड़ निकाल ली। अब मल्टीप्लेक्स और ओवरसीज सिनेमा का बाजार खुला था। अमिताभ के बाद शाहरूख, आमिर, सलमान, ऋतिक आदि ग्लोबल चेहरे और भाव-भंगिमा वाले अभिनेताओं केसाथ ऐसी फिल्मों का बाजार बना जिनका रिश्ता यहां के कस्बों और गांव के लोगों के साथ नहीं था। देश का प्रतिबिंब कही जाने वाली इन फिल्मों में उनकी उपस्थिति गाली की तरह थी। एक ऐसा सपना जो सिर्फ सपना था। वह ‘दीवार’ और ‘कुली’ केनायक की तरह प्रेम करके और संघर्ष करके अपने को निचले पायदान से ऊपर खिसकाने की कोशिश नहीं कर सकता था। उसकी जांबाजी अब विजय नहीं था। वह विलायत रिटर्न मेमों और बाबुओं का ख्याल रखने वाला ननकू काका भी नहीं रह गया था। उसकी जगह गेट के बाहर मूर्तिवत खड़े एक दरबान की जगह थी, जिसका गेट केभीतर की दुनिया में कोई प्रवेश नहीं था। इन फिल्मों में खेत, गांव और खलिहान नहीं थे। एक टेरेस पर कृत्रिम रोशनी से भरी दुनिया थी जिसमें न नीम के झोंके थे, न बरगद की छांव। वहां सीरीज लाइटों में लिपटे बोंसाई की दुनिया थी या फिर उसकी उपस्थिति जुर्म में लिप्त खलनायक की भाषा में थी।
इन सबमें किससे साधारणीकरण हो आम लोगों का न देश अपना, न काल और पात्र तो वे थे ही नहीं। 1991 की खुली आर्थिक नीति के बाद बाजार में यांत्रिक और सस्ता मनोरंजन था। मुंबई इलाकों की लोककलाएं, जिनकी कोई पहचान नहीं थी और जिन्हें संरक्षण नहीं था, बिलबिला रही थीं या ऐसा होने की कगार पर थीं। समृध्द तबकों से बाईजी का नाच और थोड़े कमतर स्तर पर लौंडा नाच या हरबोलवा का बाजार खत्म होने लगा था। बड़ी आबादी सिनेमाई मनोरंजन उद्योग पर निर्भर थी, लेकिन वह उन्हें गुदगुदा भी नहीं पाता था। इस दौर के सिनेमा से वह खुद का जुड़ाव महसूस नहीं कर पा रहा था।
भोजपुरी फिल्मों की तीसरी उठान के कारणों में मनोरंजन से वंचित इसी बड़ी आबादी का हाथ है। मुख्यधारा सिनेमा से बाहर कर दिए गए लोगों में नए दौर की भोजपुरी फिल्मों ने आशा जगाई। 2001 में ‘सैंया हमार’ और 2003 में ‘ससुरा बड़ा पैसेवाला’ ने कम बजट में बड़ी कमाई कर लोगों को चौंकाया तो इसमें उस सिनेमा का कम, मनोरंजन की भुभुक्षा का बड़ा हाथ है। इन फिल्मों को सिनेमा के समालोचन की कसौटी पर कसें तो हाथ भी नहीं आएगा। बस इसमें भाषा और भंगिमाएं भर अपनी हैं। कैमरे और संपादन की कलात्मकता नहीं, बस हल्लड़ई का दस्तावेजीकरण है। दस्तावेजीकरण शुरूआती फिल्मों में भी है, लेकिन इनमें एक कलात्मक ऊंचाई भी है। गीत, संगीत, और अभिनय हर क्षेत्र में, भोजपुरी समाज और लोककलाकी बारीक पकड़ है। नासिर हुसैन की फिल्मों को इस लिहाज से देखा जा सकता है। वे तत्कालीन जातीय जकड़न के खिलाफ, सामंतवाद के खिलाफ, आर्थिक बदहाली के कारणों की पड़ताल करते दिखेंगे। ऐसा करते हुए यह नहीं लगेगा कि परदे पर भाषण कर रहे हैं। हां, उनकी सीमाएं भी हैं, लेकिन इस माध्यम की समझ में बहुत सी चीजें ढंक जाती हैं, इसीलिए वह भोजपुरी सिनेमा के दादा साहेब हैं।
लेकिन कमाई बड़ी है, बाजार बड़ा है और खर्च बस किसी बड़ी फिल्म केहेयर ड्रेसर जितना। ऐसा सौदा किसे नहीं भाएगा। बस, दिलीप कुमार से लेकर अमिताभ बच्चन तक सबके नाम इस बहती गंगा में डूबने-उतरने लगे। चालीस वर्षों के अपने सफर में जिस भाषा में सिर्फ 200 फिल्में बनीं हो, अकेले 2003 और 2006 तक दो सौ से ज्यादा फिल्में लाइन में लग गई। फिल्म इतिहास में यह अपने तरह का एक अनोखा रिकार्ड है। हर साल औसतन तीन-चार फिल्मों की जगह सलाना साठ-सत्तर फिल्में बनने लगीं। आखिर मामला क्या है? इसका सटीक जवाब एक निर्देशक ने खुद दिया कि भोजपुरी सिनेमा उद्योग में चीजें मैनेज होती हैं। और यहां फिल्म शूट के लिए चलताऊ मुहावरा है लपेट लेना। यह खुद भोजपुरी भाषियों और सिनेमा दर्शकों केलिए अपमानजनक शब्द है। आप एक ऐसे दर्शक वर्ग केलिए फिल्में बना रहे हैं जो कुछ भी देखने को तैयार है। उसके सामने कुछ भी आप परोस सकते हैं।
ऐसा नहीं है कि भोजपुरी में संगीत, गीत और नाटक की परंपरा नहीं रही है। आखिर भिखारी ठाकुर, तुलसी, कबीर की जमीन वही है। वहीं से मोती बीए, बिस्मिल्लाह खान, अनजान और समीर आते हैं। उसी जमीन से महेंद्र मिसिर और पंडित छन्नूलाल मिसिर आते हैं। लेकिन, यह सच है कि संगीत केअलावा बाकी अनुशासनों की कोई जमीन नहीं रही। इस इलाके से आने वाले कवियों, लेखकों का इस सिनेमा से कोई लगाव नहीं है।
समाज में जिन वर्गों का वर्चस्व है, वह कलाभोगी है। वह तीज-त्यौहार, आनंद के मौके पर किराए का जमावड़ा करवाता है। उसके यहां अभी भी बेटे-बेटियों में कलात्मक संस्कार देने का आम रिवाज नहीं है, जिस समाज में कला की आधारभूत संरचना मजबूत नहीं है, उसके प्रति सम्मान का भाव नहीं है, वह वहां उपभोक्ता वस्तु भर रहेगी। वहां के समाज को अनुदित या उच्छिष्ट कला उत्पादनों पर आश्रित रहना होगा। भोजपुरी बाजार में मौजूद उत्पादों पर नजर डालें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि उस पर ऐसे लोगों और समुदायों का वर्चस्व है जिनमें भोजपुरी इतिहास, कला और संस्कृति का ‘स’ भी उपस्थित नहीं है।
हिंदी जनपद की दूसरी संगबहिनों के इलाके में भी कोई खुशगवार स्थिति नहीं है। वहां की जनता भी भोजपुरी के विकास मार्ग को ही अपनाने जा रही है। यह तथ्य है कि मुख्यधारा सिनेमा के कंटेंट में उसकी संगबहिनी भाषाओं के विषयों और लोगों की उपस्थिति कम हुई है। लेकिन उस अभाव की पूर्ति करने वाली कला में अगर कलात्मक ऊंचाई नहीं होगी तो वह लंबी रेस में नहीं चल पाएगी। जरूरत है उसके उपादानों और उपकरणों को मजबूत बनाने की। संभवत: इस मजबूती से हिंदी भी मजबूत होगी और उसका सिनेमा भी।









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