किंग खान की फिल्मी यात्रा की पूरी दास्तां
बचपन : पापा गांधीवादी थे, मां व्यवहारिक महिला
मेरी मां बहुत सख्त मन की महिला थी। किसी भी तरह के
दुख-कष्ट में उन्हें टूटते हुए नहीं देखा है
अपने माता-पिता से जुड़ी यादों को बयां करने जाऊं, तो मुझे एक किताब लिखनी पड़ेगी। मेरे पिता का नाम मीर ताज मोहम्मद था। वो स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने देश के स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया था। पापा की जुबान से शहीद खुदीराम बोस की कहानी सुनी है। उनकी कहानी सुनाते समय पापा बहुत उत्तेजित हो जाते थे। मात्र 19 साल की उम्र में खुदीराम देश के लिए फांसी पर चढ़ गए। गांधीवादी होने के बावजूद पापा क्रांतिकारियों की बहुत इात करते थे।
1981 में जब पापा की मृत्यु हुई, मैं बहुत छोटा था। दीदी मुझसे उम्र में थोड़ी बड़ी थी। मेरी मां बहुत सख्त मन की महिला थी। किसी भी तरह के दुख-कष्ट में उन्हें टूटते हुए नहीं देखा है। वह मजिस्ट्रेट थीं। पापा की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने अकेले दमखम पर हम दोनों बच्चों का लालन-पालन किया। मेरे अभिनय केशौक से मम्मी-पापा दोनों ही वाकिफ थे। पापा के इंतकाल के बाद मेरे इस शौक को मां ने हमेशा प्रोत्साहित किया। बाद में मेरे कुछेक प्ले और मेरे पहले टीवी सीरियल ‘फौजी’ को मां ने देखा था। लेकिन बतौर हीरो वह मेरी कोई फिल्म नहीं देख पाई। यह बात हमेशा मुझे कचोटती रहती है। आज मैं जो खूबसूरत लम्हें बिता रहा हूं, उसे अपने माता-पिता के साथ शेयर नहीं कर पा रहा हूं। मम्मी-पापा ने बिल्कुल अपने ढंग से हमारी परवरिश की है। चूंकि दोनों ही बहुत शिक्षित थे, इसीलिए हम दोनों की पढ़ाई-लिखाई पर उनकी तीक्ष्ण नजर थी। बहुत अच्छे स्कूल में हमारी शिक्षा हुई है। मैं दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल में पढ़ता था। मेरी मां का मानना था कि अपनी शिक्षा को अच्छी तरह से पूरी करने के बाद, आप अपना पसंदीदा कैरियर बनाने के लिए एकदम परफेक्ट हो जाते हैं। आज मैं और गौरी अपने दोनों बच्चों आर्यन और सुहाना के बारे में भी ऐसा ही सोच रहे हैं। यह पूरी तरह से मेरे मम्मी-पापा के तालीम का ही नतीजा है।
मां को चंपा बुलाता था
जब मेरी थोड़ी उम्र और समझने की शक्ति बढ़ी,
तो मां को चंपा कहना मैंने खुद-ब-खुद बंद कर दिया
×ðरी मां सिर्फ नौकरी को लेकर व्यस्त नहीं रहती थी। इसके बाद सोशल वर्क में भी उनका काफी समय लगता था। पापा की मृत्यु के ठीक दस साल बाद 1991 में मां का निधन हुआ। सच कहूं तो आज भी मां को मैं बहुत मिस करता हूं। मां को चंपा कहकर संबोधित करता था। असल में हमारे पड़ोस की आंटी का नाम चंपा था। उसकेऔर मेरे परिवार के सभी लोग उसे चंपा कहकर ही संबोधित करते थे। इस वजह से चंपा नाम मेरे दिलो-दिमाग में बस गया था। जब मेरी थोड़ी उम्र और समझने की शक्ति बढ़ी, तो मां को चंपा कहना मैंने खुद-ब-खुद बंद कर दिया। बचपन में रोना-धोना और बेवजह की जिद करना मेरे स्वभाव में नहीं था। घर में एक पियानो था। मैं अक्सर उसे लेकर ही व्यस्त रहता था। उस समय मेरी उम्र दो-तीन साल रही होगी। खुद से जुड़ी यह घटना मैंने अपने पापा से सुनी थी। एक दिन मुझे घर में अकेला छोड़ मम्मी-पापा दीदी को लेकर थोड़ी देर के लिए पड़ोस में कहीं गए थे। घर आकर मुझे देखकर डर के मारे उनकी चीखें निकल गई। शीशे की दवात टूटी हुई थी। पूरे घर में स्याही फैल गई थी। और उस स्याही के ऊपर एक सांप बिलबिला रहा था। स्याही की वजह से सांप अच्छी तरह से हिल नहीं पा रहा था। दवात मैंने ही तोड़ी थी। सांप मुझे काट सकता था, इस बात का मुझे जरा भी इल्म नहीं था। मैं तो हमेशा की तरह पियानो में व्यस्त था। मम्मी-पापा के चिल्लाने की वजह से आस-पास के लोग जमा हो गए। मेरे घर के सामने एक छोटी-सी भीड़ जमा हो गई। पापा-मम्मी को हर आदमी अपना सुझाव देने लगा था। सांप यदि जहरीला हुआ, तो क्या होगा। मेरी दीदी डर के मारे रो पड़ी। शायद चिल्ला-चिल्ली से घबरा कर सांप स्याही से बाहर निकल कर एक तरफ सरपट भाग गया। सभी ने ठंठी सांसें लीं, जबकि मैं तब भी पियानो की धुनें छेड़ने में व्यस्त था।
ऐसे आना हुआ अभिनय में
आज मैं एक्टिंग के क्षेत्र में जो कुछ भी कर पाया हूं, उसका काफी श्रेय डिसूजा सर और बैरी जॉन सर को जाता है
×ðरे स्कूल सेंट कोलंबस के हेड मास्टर थे एरिक डिसूजा। हेड मास्टर होने पर भी उनकी उम्र ज्यादा नहीं थी। ‘ही वॉज ए यंग मैन।’ डिसूजा सर के अंदर हेड मास्टर जैसी अकड़ नहीं थी। स्कूल के बच्चों के साथ वह एकदम दोस्त बन जाते थे। वह मुझे बहुत प्यार करते थे। डिसूजा सर ने ही मुझे खेल-कूद और एक्टिंग के मामले में प्रोत्साहित किया था। उनसे एक्टिंग के बारे में काफी कुछ सीखा है। वैसे बाद में बैरी जॉन सर ने मुझे एक्टिंग का और अच्छा ज्ञान दिया। आज मैं एक्टिंग के क्षेत्र में जो कुछ भी कर पाया हूं, उसका काफी श्रेय डिसूजा सर और बैरी जॉन सर को जाता है। 1984 में मैं दिल्ली के एक थियेटर ग्रुप में शरीक हुआ था। इसे एक दुर्घटना ही कहिए। मैं बहुत अच्छा फुटबॉल खेलता था। स्कूल की टीम की तरफ से एक बार सुब्रत कप का एक मैच खेलते समय मैदान में फिसल कर गिरने से मेरे पीठ की हड्डी टूट गई। छह माह कंप्लीट बेड रेस्ट लेना पड़ा। इसके बाद जब कॉलेज में आया तो खेलने-कूदने की मनाही हो गई। स्कूल की अपेक्षा कॉलेज में पढ़ाई का इतना प्रेशर नहीं था तब बैरी जॉन सर के साथ मेरा परिचय हुआ। उन्होंने मेरा इंटरव्यू लेने के बाद निर्णय किया कि अभिनेता के तौर पर नहीं नाटय दल के एक मुख्य डांसर के तौर पर मुझे लिया जाएगा। जबकि प्रोफेशनल डांसर को लेकर मेरे मन में कुछ और धारणाएं थीं, सर से इस बारे में मतभेद होने के बावजूद उनके निर्णय के खिलाफ कुछ बोलने का साहस मेरे अंदर नहीं था।
मैं हूं खिलाड़ी
स्कूल में फुटबॉल, हॉकी और क्रिकेट तीनों खेलों में ही गहरी रुचि थी। जिम्नास्टिक भी किया है
¹ñर, खेल-कूद की बात चलने पर मैं स्थिर नहीं रह पाता हूं। शूटिंग के समय खेल को लेकर कोई चर्चा शुरू होने पर मैं अपने आपको रोक नहीं पाता। शूटिंग बंद कर मैं इस चर्चा में शामिल हो जाता हूं। स्कूल में फुटबॉल, हॉकी और क्रिकेट तीनों खेलों में ही गहरी रुचि थी। जिम्नास्टिक भी किया है। फुटबॉल मैं राइट आउट खेलता था। हॉकी में सेंटर फारवर्ड और क्रिकेट में विकेट कीपिंग करता था। अच्छे बैट्समैन के तौर पर भी मुझे काफी तारीफ मिली। स्कूल की तरफ से मैं बराबर सुब्रत कप खेलता था। फुटबाल में बंगभाषियों की रुचि बहुत गहरी है। अक्सर हर साल कोई ना कोई बंगभाषी दल सुब्रत कप जीतता था। सुब्रत कप में हमारी टक्कर दिल्ली के रायसीना स्कूल से होती थी। उस समय रायसीना में बंगाली लड़कों की संख्या ज्यादा थी। इसीलिए हर बार हम यह प्रतियोगिता हार जाते थे। बंगाली लड़के पूरी तरह से हम पर हावी हो जाते थे। दिल्ली के हंसराज कॉलेज से मैंने इकनॉमिक्स-ऑनर्स लेकर बीए की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद लगभग डेढ़ साल एमए की पढ़ाई भी की है। लेकिन मास्टर डिग्री पूरी कंपलीट नहीं कर पाया। यह सोचकर मास कम्यूनिकेशन के रिसर्च सेंटर में दाखिला लिया था, शायद एक और डिग्री मिल जाए।
कोलकाता मेरे पसंद का शहर
कोलकाता का जीवन बहुत ही रोचक है। इसीलिए कोलकाता पर ऑडियो विजुएल बनाने के अपने निर्णय को लेकर मैं बहुत खुश था
©Uन दिनों फर्स्ट इयर फाइनल परीक्षा के लिए हमें ऑडियो विजुअल प्रोग्राम बनाना पड़ता था। मैंने ‘सिटी ऑफ ज्वॉय-कोलकाता’ को लेकर ऐसा ही एक प्रोग्राम तैयार किया। इसके लिए 1989 में पूरे एक माह तक मैं कोलकाता में रहा हूं। कोलकाता का जीवन बहुत ही रोचक है। इसीलिए कोलकाता पर ऑडियो विजुएल बनाने के अपने निर्णय को लेकर मैं बहुत खुश था। वहां मैं डॉनकानस कंपनी केगेस्ट हाउस में ठहरा था। कोलकाता में मेरा कोई रिश्तेदार नहीं था। मेरी पत्नी के कई रिश्तेदार वहां रहते है। लेकिन उस समय तक मेरी शादी नहीं हुई थी। इसीलिए किसी को पहचानने का सवाल ही नहीं उठता। तब सुबह से शाम तक कैमरा लेकर कोलकाता के विभिन्न जगहों में घूमता और तस्वीरें खींचता रहता था। तरह-तरह के दिलचस्प सब्जेक्ट होते थे। इतने मिलनसार स्वभाव के लोग मैंने भारत के किसी भी शहर में नहीं देखे हैं। किसी से रास्ता या घर का पता पूछने पर संभव हुआ तो वह खुद आपको वहां पहुंचा आएगा। 1989 में जब मैं पहली बार कोलकाता आया, मेरा पहला टीवी सीरियल ‘फौजी’ शुरू हो गया था, इसीलिए लोग मुझे थोड़ा बहुत पहचानने लगे थे। इसमें मेरे किरदार का नाम था अभिमन्यु राय। यह बंगाली नाम है। इसीलिए कई लोग यह सोचते थे कि मैं बंगभाषी हूं। एक दिन घूमते हुए यहां के थियेटर रोड के एयरकंडीशंड मार्किट में गया। वहां जाकर पता चला कि उस दिन मार्केट बंद है। वापिस लौट रहा था कि अचानक एक युवती सामने से आकर बोली-’मैंने आपको ‘फौजी’ में देखा है। क्या सचमुच आपका नाम अभिमन्यु राय है?’ उस युवती की बात सुनकर मैं हंस पड़ा। मेरा असली नाम बताने पर भी उन्हें यकीन नहीं आ रहा था। उसने बताया कि वह ‘फौजी’ की फैन है। फिर वह बोली, ‘आगे और अच्छा अभिनय कीजिए, आप बहुत आगे जाएंगे।’ मेरी यह बात वह पढ़ेगी या नहीं मुझे पता नहीं, यदि वह इसे पढ़ती है, तो अनजानी युवती को शाहरूख खान बहुत-बहुत शक्रिया अदा करता है।
मिष्ठि दोई का जवाब नहीं
मेरे माता-पिता, दीदी और मैं हमारे परिवार के सभी लोग वहां के मिष्ठि दोई के भक्त थे
कोलकाता की एक खास चीज के बारे में बचपन से ही सुनता आ रहा था। वह है ‘मिष्ठि दोई’। मेरे माता-पिता, दीदी और मैं हमारे परिवार के सभी लोग वहां के मिष्ठि दोई के भक्त थे। कोलकाता से मेरे किसी दोस्त के दिल्ली आने की बात सुनकर ही वे उन्हें मिष्ठि दोई लाने के लिए लिखते थे। इसका स्वाद हमेशा मेरे मुंह में लगा रहेगा। अब तो कोलकाता जाकर सबसे पहले जी भर कर मिष्ठि दोई का आनंद लेता हूं। उन दिनों दिनभर कैमरा लेकर पूरे शहर का चक्कर मार कर तस्वीरें लेता रहता था। ऐसे में मिष्ठि दोई और दोई के बर्तन का फोटो खींचने की इच्छा हुई। तीन दिन लगातार एक्सप्लानेड स्थित के.सी.दास की मिठाई दुकान में गया, मगर तीनों ही दिन वहां दोई खत्म हो चुकी थी। फिर वहां एक दिन जाकर देखा कि चार-पांच दोई की हांडी सजी हुई है। उस दिन दुकान वाले ने मुझे भी मनचाही तस्वीरें खींचने में काफी मदद की। कितने सुंदर ढंग से मिट्टी की हांडी में दोई जमाया जाता है। इसके बाद बारी आती है, कोलकाता के ट्राम की। रास्ते के ऊपर लाइन बिछी हुई है, उसके ऊपर से ट्राम चल रहा है। इसमें बैठकर अद्भुत रोमांटिक अहसास होता है। भारत के किसी भी शहर में यह देखने को नहीं मिलता है। सिर्फ ट्राम नहीं कोलकाता की ढेरों अच्छी तस्वीरें मैंने खींचीं थीं। घर में आकर मां और दीदी को यह तस्वीरें दिखाने पर वह भी इस शहर को लेकर अभिभूत हो गई। इस एक महीने में मैं अपने ढंग से इस शहर की सड़कें नापता रहा। कोलकाता का कोई कोना बाकी नहीं रखा।
आज भी मां शिद्दत से याद आती है
मां जब तक जीवित थी, हमारे घर में हर तरह के निर्णय वही लेती थीं। आज भी हम कोई भी निर्णय लेने से पहले उस कमी को शिद्दत से महसूस करते हैं ðरे पूर्वज पेशावर में रहते थे। सन् 1947 से पहले पाकिस्तान का नाम नहीं था। इस सच्चाई को तो बताना ही पड़ता है। पापा पाकिस्तान से भारत आए थे। धर्म के नाम पर इस देश के विभाजन ने हजारों स्वाधीनता सेनानियों के स्वप्न को छिन्न-भिन्न कर दिया था। कितने लोगों की आंखें नम हुई थी, उसे मुझ जैसे लोग सिर्फ महसूस कर सकते है। मेरे पापा ने भी ऐसी खंडित आजादी नहीं मांगी थी। उनका मन इससे इतना आहत हुआ था कि इसके बाद फिर कभी वह पाकिस्तान लौटकर नहीं गए। दिल्ली में वह सेटल हो गए। 1965 के 2 नवंबर को मेरा जन्म हुआ। दीदी और मेरे बीच उम्र का ज्यादा अंतर नहीं है। मेरी दीदी का नाम शहनाज है। मेरी बीवी गौरी और शहनाज दो बहनों की तरह है। उनमें जबरदस्त मेल है। शहनाज अपनी बूटिक को लेकर ही व्यस्त रहती है। मैं अक्सर दीदी की हिदायत के मुताबिक ही कपड़े पहनता हूं। जब मैं सोलह साल का था पापा अचानक हमें छोड़कर चले गए। पापा की मृत्यु ने मां को एकदम तोड़ दिया। हम तब छोटे थे और स्कूल में पढ़ते थे। मां के अलावा हमारा देखभाल करने वाला कोई नहीं था। नौकरी और गृहस्थी संभालना, सब कुछ मां को अकेले ही करना था। हम मां के अलावा कुछ भी नहीं जानते थे। 1991 में पापा की तरह मां भी हमें छोड़ कर चली गई। उस वक्त पापा-मम्मी किसी की भी इतनी उम्र नहीं हुई थी। मां जब तक जीवित थी, हमारे घर में हर तरह के निर्णय वही लेती थीं। आज भी हम कोई भी निर्णय लेने से पहले उस कमी को शिद्दत से महसूस करते है। मां की मृत्यु के कुछ दिन बाद मैंने गौरी से शादी कर ली। स्कूल की पढ़ाई के दिनों से मैं उसे जानता था। हमारी लव-मैरिज थी। गौरी हिंदू है। उसका परिवार किसी भी तरह से नहीं चाहता था कि हमारा विवाह हो। इसे लेकर कम झंझट नहीं हुए। लेकिन मैंने भी ठान रखी थी कि शादी करूंगा तो गौरी से ही करूंगा। गौरी भी यही चाहती थी। हमारा विवाह एक अलग तरह का एडवेंचर था। मुझसे गौरी को दूर रखने के लिए एक दिन उसके परिवार वालों ने गौरी को मुझसे अलग करके मुंबई भेज दिया। मेरा मूड उखड़ गया, एक दिन गौरी के साथ किसी बात पर मेरी खूब बहस हुई। शायद इसी वजह से वह मुझसे नाराज होकर मुंबई चली गई। सोचा था, उससे अपना दुख बता कर क्षमा मांग लूंगा। पर जब सब जान पाया, तब तक बहुत देरी हो चुकी थी।
यूं शुरू हुआ हिंदी फिल्मों का सफर
मुंबई में आकर पहली बार जी.पी.सिप्पी की फिल्म ‘राजू बन गया जेंटलमैन’ साइन की
1991 की बात है। मां की मृत्यु के बाद मेरा मन बहुत खराब हो गया था। उनके बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। तब तक मेरे तीन सीरियल ‘फौजी’, ‘सर्कस’ और ‘दिल दरिया’ आ चुके थे। मुझे फिल्मों के ऑफर मिलने लगे थे। दिल्ली में फोन करके, तो कभी घर पर आकर निर्माता अच्छी-अच्छी फिल्मों का ऑफर दे रहे थे। लेकिन तब मेरी यह सोच थी, सीरियल कर रहा हूं, इसीलिए फिल्में नहीं करूंगा। थियेटर करूंगा। लेकिन मां की मृत्यु ने मुझे भीतर से इस कदर तोड़ दिया कि दिल्ली में रहने की इच्छा ही नहीं हो रही थी। घर पर रहने से एक घुटन-सी लगती थी। इसीलिए तय किया कि छह महीने बंबई में बिताकर आता हूं। बंबई यानी मुंबई में आकर पहली बार जी.पी.सिप्पी की फिल्म ‘राजू बन गया जेंटलमैन’ साइन की। सईद मिर्जा मेरे प्रिय निर्देशक है। उनके सीरियल ‘सर्कस’ ने मुझे काफी लोकप्रियता दी थी। मैं खुश था कि वही इस फिल्म के निर्देशक थे। इसके बाद एक-एक करके चार और नई फिल्में साइन की। राजीव मेहरा की ‘चमत्कार’ हेमा जी की ‘दिल आशना है’, राकेश रोशन की ‘किंग अंकल’ और राज कंवर की ‘दीवाना’। देर से शुरू होने के बावजूद मेरी पहली रिलीज फिल्म ‘दीवाना’ थी। इसके बाद रिलीज हुई ‘चमत्कार’, ‘राजू बन गया जेंटलमैन’, ‘किंग अंकल’, ‘दिल आशना है’, ‘माया मेमसाहब’, ‘बाजीगर’, ‘डर’, ‘कभी हां कभी ना’, ‘अंजाम’, ‘करण-अर्जुन’ आदि। सोचा था दो-चार फिल्में करके दिल्ली वापिस लौट जाऊंगा। पर ऐसा नहीं हुआ। एक फिल्म के हिट होते ही दस फिल्मों के ऑफर आने लगे। मैं हिंदी फिल्मों के साथ और ज्यादा जुड़ गया। दिल्ली लौटना बिल्कुल ही संभव नहीं हुआ। वैसे कैरियर के शुरू-शुरू में मैं दिल्ली-मुंबई के चक्कर लगाता रहता था। पांच दिन मुंबई में तो, दो दिन दिल्ली में बिताता था। उन दिनों गौरी दिल्ली में थी। मेरी दीदी भी दिल्ली में अकेली थी। वैसे गौरी नियमित रूप से दीदी की खोज-खबर लेती रहती थी, फिर भी भाई के तौर पर उनको लेकर मेरी अलग चिंता थी। मेरी इतनी व्यस्तताओं की वजह से गौरी नाराज रहने लगी थी। वह धमकी देने लगी थी-
ज्यादा दिन ऐसा नहीं चलेगा। इसीलिए मैंने तय किया कि शादी कर लूं। 1991 के अक्तूबर माह में गौरी से मैंने शादी कर ली। इसके बाद मैं, दीदी और गौरी सभी मुंबई चले आए। हमारी शादी को लेकर गौरी के परिवार में सभी ने जोरदार विरोध किया था। लेकिन गौरी ने भी जिद ठान ली थी कि वह मुझसे ही शादी करेंगी। अंतत: लड़की की जिद के आगे परिवार वालों को झुकना ही पड़ा।
…पर गौरी नहीं मिली
एक कैमरा और कुछ रुपए लेकर मैं मुंबई आ गया। यहां आकर दस दिनों तक मैं लगातार गौरी की तलाश करता रहा। उसका पता-ठिकाना कुछ भी मेरे पास नहीं था
अब अपने उस एडवेंचर के बारे में बताता हूं। मुंबई जैसे बड़े शहर में किस तरह से मैंने गौरी को ढूंढा था। सन् 1988 की बात है। गौरी मुंबई चली आई है, यह सुनकर मेरी हालत पागलों जैसी हो गई थी। उसका पता, फोन नंबर कुछ भी उसके परिवार वालों से नहीं मिला। मगर मन में एक बात ठान ली थी कि चाहे कुछ भी हो गौरी को मुझे ढूंढना ही है। एक कैमरा और कुछ रुपए लेकर मैं मुंबई आ गया। यहां आकर दस दिनों तक मैं लगातार गौरी की तलाश करता रहा। उसका पता-ठिकाना कुछ भी मेरे पास नहीं था, फिर भी मन में एक दृढ़ता थी, कैसे भी उसे खोज निकालना है। पहली बार मुंबई आया था। इस शहर को मैं बहुत अच्छी तरह से नहीं जानता था। मेरा एक दोस्त मुंबई में रहता था। उसके यहां जाकर ठहरा। तीन-चार दिन उसके पास ही रहा। किसी एक काम के लिए मेरे उस दोस्त को मुंबई से बाहर जाना पड़ा। इसीलिए निश्चित आश्रय से बाहर निकल कर मैं सड़क पर आ गया। दूसरी ओर जेब का पैसा भी खत्म होने को था। किसी छोटे-मोटे होटल के अलावा मुंबई के बारे में कुछ भी नहीं जानता था। हाजी अली हमारे लिए तीर्थस्थान की तरह है। कई फिल्मों में मेरीन ड्राइव को देखकर यह जगह मेरे जेहन में बस गई थी। सारा दिन चकरघिन्नी की तरह मेरीन ड्राइव, जुहू चौपाटी और उसके आसपास घूमता रहता था। गौरी को खोजता रहता था। उसे तैराकी पसंद है। इसीलिए सी-बीच पर उसे ढूंढता रहता था। लेकिन गौरी मिल ही नहीं रही थी। कभी-कभी हताश होकर मेरीन ड्राइव के कंक्रीट के बेंच पर निराश होकर बैठ जाता था। ओबेरॉय होटल के उल्टी तरफ के फुटपाथ पर भी सो कर रात गुजारी। तब पैसा बचाने के लिए एक टाइम ही खाता था। एक दिन आर्थिक मजबूरी में आकर कैमरे को बेच दिया। क्योंकि जेब में एक पाई नहीं बची थी। कैमरा बेचकर अच्छी रकम मिल गई। इस बीच एक दिन फिर हाजी अली देख आया। लेकिन गौरी नहीं मिली। इतने दिन पैदल ही घूमता रहा था, अब पैसा आते ही टैक्सी से चक्कर लगाने लगा। एक दिन एक पंजाबी ड्राइवर ने टैक्सी चलाते हुए, मुझसे गप्पे लगाने शुरू कर दिए। तरह-तरह की बातें। वह कब मुंबई आया, शादी करके गृहस्थी बसाई, कितने बच्चे हैं, बच्चे किस स्कूल में पढ़ते हैं, बीवी सुबह उठकर उसके लिए क्या टिफिन बनाती है आदि-आदि।
गौरी मिल गई…
मैंने गौरी को ढूंढ निकाला। उस समय शाम का वक्त था। अपने किसी रिश्तेदार के साथ वह बीच पर टहल रही थी
सरदार जी की बातों का कोई अंत नहीं था। मैंने तब उनसे पूछ लिया- सरदारजी, क्या चौपाटी के अलावा भी यहां कोई बीच है। मेरी बात सुनकर सरदारजी जोर से हंस पड़े। हंसते हुए बोले, ‘भाई साहब लगता है बाम्बे में नए आए हो। यहां बहुत बीच है।’ यह कहकर सरदारजी मुझे मडआईलैंड बीच पर ले आए। और बहुत आश्चर्यजनक ढंग से उसी बीच पर मैंने गौरी को ढूंढ निकाला। उस समय शाम का वक्त था। अपने किसी रिश्तेदार के साथ वह बीच पर टहल रही थी। मुझे देखकर वह सकते में आ गई। कब आए, कहां से आ रहे हो? आदि-आदि उसके सवालों का कोई अंत नहीं था। मैं कुछ जवाब नहीं दे पा रहा हूं, यह देखकर गौरी सकते में आ गई थी। ‘क्या हुआ, तुम बात क्यों नहीं कर रहे हों?’ अपनी आंखें मुझ पर दृढ़ता से टिकाते हुए गौरी ने पूछा। दिल्ली में रहने के दौरान उससे मेरा जो झगड़ा हुआ था, उसे लेकर उसकी बातों में कहीं भी कोई गुस्सा नहीं झलक रहा था। मैं उससे क्या बात करता। उसे एकटक देखता रहा। उसे इस तरह से यहां ढूंढ निकालूंगा, यह मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। पिछले नौ दिनों से उसे ढूंढने की खातिर मैंने क्या-क्या नहीं किया। आश्चर्यजनक घटनाएं अचानक ही घटित होती है। गौरी ने अपने रिश्तेदार से मेरा परिचय करवा दिया। गौरी से मेरा क्या रिश्ता है, इसे वह समझ गए थे। यहां गौरी ने ही उन्हें सब कुछ बता दिया था। मुझे देखकर थोड़ा हंसकर वह एक तरफ खड़े हो गए। इसके बाद फिर शुरू हुआ हम दोनों के बीच लड़ाई-झगड़ा। गौरी थोड़ा रोई-धोई भी। मैंने उसे दिलासा दिया। मुंबई में मैं और दो दिन ठहरा। इतने दिनों तक गौरी के बिछोह में जिस तरह से पागल हो गया था, उसका अंत सुहाना था। बेहद खुश होकर फिर दिल्ली लौट आया। मेरे लौट आने के कुछ दिन बाद गौरी भी दिल्ली वापिस आ गई।
सत्यजीत रे व घटक सर ग्रेट हैं
भारतीय फिल्मकारों की बात उठने पर मैं जिन दो को मैं सबसे श्रध्दा के साथ याद करता हूं, वह है सत्यजीत रे और ऋत्विक घटक
Ùæटकों के मेरे अनुभव ने अभिनय में मुझे काफी मदद की है। स्टेज पर जिस तरह से अभिनय करता था, फिल्मों में भी वैसा ही करता हूं। सिर्फ एक परिवर्तन आया है। स्टेज पर जरा जोर से डॉयलॉग बोलना होता था, फिल्मों में वैसा नहीं होता है। पहले ही बता चुका हूं, एक्टिंग का जो भी एबीसीडी मैंने सीखी है उसका सारा श्रेय बैरी जॉन सर और फादर एरेक डिसूजा को जाता है। इन लोगों ने ही मुझे अभिनेता बनाया है। इनके अलावा जिन निर्देशकों के साथ काम करता हूं, उन सभी से आज भी एक्टिंग सीख रहा हूं, वैसे भी सीखने का कोई अंत नहीं है। भारतीय फिल्मकारों की बात उठने पर मैं जिन दो को मैं सबसे श्रध्दा के साथ याद करता हूं, वह है सत्यजीत रे और ऋत्विक घटक। सिर्फ फिल्मकार कहने पर उनका असम्मान होगा और एक है विदेशी फिल्मकार फेलिनी। वह सचमुच महान है। वैसे अमूमन विदेशी क्लासिक फिल्में देखना ही मैं पसंद करता हूं। कई दिन तक ग्रेट मास्टर की फिल्में देखकर ही मैं अपना समय व्यतीत कर सकता हूं। कॉलेज में फिल्म मेंकिंग का कोर्स करते समय मैंने ढेरों अच्छी फिल्में देखी है। अपू सीरिज की फिल्में ‘चारूलता’, ‘अरण्येर दिन रात्रि’…राय मोशाय की मैंने कई फिल्में देखी है। उनकी अंतिम फिल्म ‘आगंतुक’ देखी है। कितनी अच्छी फिल्म है। विश्व के दस श्रेष्ठ निर्देशकों में सत्यजित रे एक हैं। ऋत्विक सर भी बहुत बड़े फिल्मकार थे। उनकी ‘मेघे ढाका तारा’, ‘कोमल गंधार’, ‘अजांत्रिक’ जैसी फिल्मों की कोई तुलना नहीं हो सकती है। मुझे लगता है उनकी हर फिल्म में एक सब्सटीटयूट पैशन मौजूद हैं। यही ऋत्विक सर की फिल्मों की विशिष्ठता होती थी। और यही पैशन उनकी फिल्मों के नस-नस में फैल जाता है। क्रमश: घटनाएं उभरने लगती हैं। सामाजिक सच्चाई उनकी फिल्मों का मुख्य विषय होता है। ट्रीटमेंट एकदम अलग। इस संदर्भ में मैं यदि अपने अभिनय की बात करूं, तो ऋत्विक सर अपने कलाकारों से जिस तरह का अभिनय करवाते थे, उनके साथ अपने स्टाइल में एक ऑफ एक्टिंग का मेल ढूंढता हूं। बहुत पहले ऋत्विक सर की पत्नी का एक इंटरव्यू पढ़ा था, उनकी दो-तीन फिल्मों का निर्माण अधूरा रह गया है। मैं वह फिल्में भी देखना चाहता हूं। इन दोनों निर्देशकों की फिल्मों में कोई भी छोटा-मोटा किरदार करने की मेरी दिली तमन्ना थी।
मेरे पसंदीदा
अर्पणा भी ऐसी सुंदरी है। सशक्त अभिनय के साथ मिलकर उनके सौंदर्य ने उन्हें एक अलग मुकाम दिला दिया है
महानायक उत्तम कुमार का मैं भी एक भक्त हूं। उत्तम कुमार की दो-चार हिंदी फिल्में ही मैंने देखी है। मेरे बंगाली दोस्तों का कहना है कि उनकी बांग्ला फिल्में और भी ज्यादा अच्छी हैं। और ऐसे दो बड़े बंगभाषी एक्टर हैं, जिनका मैं जबर्दस्त फेन हूं उत्पल दत्त और सुचित्रा सेन। ‘पैरागन ऑफ ब्यूटी’ का जो मतलब मैं समझता हूं, सुचित्रा सेन उस कसौटी में बिल्कुल खरी उतरती हैं। सुचित्रा सेन, मीना कुमारी, नर्गिस, मधुबाला, वहीदा रहमान और हाल फिलहाल की श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित के अलावा और किसी के बारे में मैं सोचता भी नहीं हूं और दो एक्टर विक्टर बनर्जी और अर्पणा सेन को मैं उनकी काम की वजह से जानता हूं। विक्टर के कैरियर के शुरूआती दौर की एकाध फिल्में मैंने देखी हैं। उनका अभिनय और उनकी फिल्मों ने मुझे कुछ प्रभावित नहीं किया है, पर वे काफी हैंडसम अभिनेता थे। अभी कुछ साल पहले मेरी विक्टर से मुलाकात हुई थी। पिता-पुत्र की कहानी पर वे एक फिल्म बनाना चाहते थे। इस फिल्म के लिए वे मुझे लेना चाहते थे। फिल्म की कहानी मुझे पसंद आई थी। मैं उनके साथ काम करने के लिए बेताब था, पर यह प्रोजेक्ट इससे आगे नहीं बढ़ा। अर्पणा भी ऐसी सुंदरी हैं। सशक्त अभिनय के साथ मिलकर उनके सौंदर्य ने उन्हें एक अलग मुकाम दिला दिया है। सिर्फ अभिनेत्री ही नहीं निर्देशन के क्षेत्र में भी अर्पणा ने एक अलग प्रतिष्ठा अर्जित की है।
कुतुब मीनार इतना ऊंचा क्यों है
आकांक्षा और सपनों के बिना कोई भी व्यक्ति बड़ा आदमी नहीं बन सकता है
बहुत जोर देने पर बचपन की कुछ यादें फिर ताजा हो जाती हैं। बचपन में एक बार पापा का हाथ पकड़ कर कुतुब मीनार देखने गया था। इसके बाद कई बार कुतुब मीनार को बहुत करीब से देखा है। लेकिन बचपन में कुतुब मीनार देखने का वह रोमांच अभी तक महसूस करता हूं। इतना ऊंचा घर भी हो सकता है। काफी देर तक भौंचक होकर आसमान की तरफ ताकने के बाद पापा से पूछा था-’डैड, इतने ऊंचे मकान को किसने बनाया?’ पापा ने मुझे मनुष्य के धैर्य, आकांक्षा और परिश्रम की ढेरों कहानियां सुनाई थीं। पापा की ये बातें आज भी मेरा रास्ता आसान कर देती हैं। पापा ने कहा था-’आकांक्षा और सपनों के बिना कोई भी व्यक्ति बड़ा आदमी नहीं बन सकता है।’ उस दिन पापा मेरा हाथ पकड़ कर पैदल चलते हुए मुझसे बहुत सारी बातें करते रहे। मैं अबोध केवल उनकी बातें सुनता रहा। ना जाने क्यों, तब मैंने कोई सवाल नहीं पूछा था। तब पापा ने कहा था-’मुन्ना तुम्हें कुतुब मीनार’ की तरह ऊंचा होना होगा। सबसे आगे तुम्हें नजर आना होगा। आज पापा की वे बातें याद करता हूं, तो मन थोड़ा बेचैन हो उठता है।
फैमिली मैन हूं
मैं पूरा फैमिली मैन हूं, एक वक्त में कई फिल्में करना मेरे वश की बात नहीं है। मेरी फिल्मी लाइफ मेरी पर्सनल लाइफ को नुकसान पहुंचाए, ऐसा मैं नहीं चाहता हूं
हीरो बनने से पहले जैसा था, वैसा आज भी हूं। मेरा शुरू से ही यह मानना था कि एक फिल्म के लिए मैं यदि तीन माह शूटिंग करुं, तो यह वक्त मेरे लिए पर्याप्त है। इससे ज्यादा मैं शूटिंग नहीं करना चाहता हूं। मेरी फिल्में चले या ना चलें, इसे लेकर मैं ज्यादा माथा-पच्ची नहीं करता हूं। मुंबई में यदि शूटिंग है, तो घर से सीधे शूटिंग और फिर शूटिंग से सीधे घर आना यही मेरा रूटीन होता है। शूटिंग के बाद कई चमचा टाइप के लोगों के साथ बैठकर निंदा रस का आनंद लेना, यह कभी मुझसे संभव नहीं हुआ। मैं पूरा फैमिली मैन हूं, एक वक्त में कई फिल्में करना मेरे वश की बात नहीं है। मेरी फिल्मी लाइफ मेरी पर्सनल लाइफ को नुकसान पहुंचाए, ऐसा मैं नहीं चाहता हूं। अब जैसा कि एक पत्रकार ने मुझसे सवाल किया था-’शूटिंग स्पॉट से मैं इतनी बार अपनी बीवी को फोन क्यों करता हूं?’ इस तरह के सवाल मुझे अच्छे नहीं लगते है। मैं अपनी पत्नी से इतना प्यार करता हूं कि दिन भर में यदि मैं सौ बार उसे फोन ना कर लूं, मुझे चैन नहीं मिलता है। मैं एक्टिंग को जितना इंज्वाय करता हूं, लोगों से मिलने में भी मुझे बड़ा आनंद मिलता है। सच तो यह है कि लोगों से जितना आप मिलेंगे आपकी जानकारी उतनी ही बढेग़ी और उतना ही ज्यादा आप सीखेंगे भी। फिल्म इंडस्ट्री में मैंने कई साल का सफर तय कर लिया है। और एक बात अच्छी तरह से जान गया हूं कि यहां रहना है, तो आपको अपने कान और आंखें हमेशा खुली रखकर लगातार संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा। वैसे यदि कोई मेरे दिल की बात जानना चाहे, तो मैं हर बार यही कहूंगा कि फिल्म से ज्यादा स्टेज मुझे पसंद है। मेरे ख्याल से फिल्म से ज्यादा स्टेज का अभिनय स्वत:स्फूर्त होता है। शायद इसीलिए फिल्मों में मेरा दूसरा टेक पहले टेक की तरह नहीं होता है। मुझे मेरा पहला टेक ही सबसे ज्यादा अच्छा लगता है।
थियेटर की बात ही कुछ और है
मेरे पास जब भी किसी फिल्म का ऑफर आता है, तो सबसे पहले मैं यह देखता हूं कि निर्देशक कौन है और मेरा किरदार कैसा है?
çÎल्ली में हमारे प्ले ग्रुप का नाम था ‘टैग थियेटर एक्शन ग्रुप।’ इसमें रघुबीर यादव के अलावा सिध्दार्थ बसु, मीरा नायर, ऋतुराज, दिव्या सेठ, संजय राय, मोहित सदानंद आदि कई लोग थे। उनमें से कुछ से कभी-कभी बातें हो जाती हैं। खैर, उन सब में सबसे ऊपर थे बैरी जॉन सर। सब कुछ बहुत अच्छी तरह से चल रहा था। लेकिन टीवी के बढ़ते क्रेज के साथ ही हमारा दल धीरे-धीरे टूटने लगा। बैरी तो आज भी छोटे-छोटे बच्चों को लेकर नाटक कर रहे हैं। बस, हम सबने अपनी अलग-अलग दुनिया बना ली है। कुछ ने तो टीवी को पूरी तरह से अपना लिया। हमारी तरह दिल्ली के कई थियेटर ग्रुप टूट गए। जहां तक मेरा सवाल है, फिल्म मेरे लिए एक वर्कशॉप की तरह है। एक्टिंग करता हूं, एक्टिंग सीखता हूं, अपनी हीरोइन और दूसरे अन्य साथी सितारों के साथ हंसी मजाक करता हूं, दूसरे कलाकारों की कला क्षमता से कुछ नया सीखने की कोशिश करता हूं। जिसके साथ भी काम करता हूं, उसके साथ एक रिश्ता बन जाता है। लेकिन मैं उन लोगों में से नहीं था, जो डायरेक्टर के सामने काम मांगने के लिए गिड़गिड़ाने लगते हैं। बल्कि मैं उन लोगों में से हूं, जो उन्हें पूरा सम्मान देते हुए, उनके साथ एक बेहद दोस्ताना रिश्ता जोड़ने का प्रयास करता है। जाहिर है इस वजह से ज्यादातर डायरेक्टर मुझे अपना कोई आत्मीय समझ कर स्नेह देते हैं। मेरे हमउम्र छोटे उम्र के निर्देशकों की बात जाने दें, बहुत सीनियर यश चोपड़ा, सुभाष घई आदि के साथ भी मेरे दोस्ताना संबंध हैं। बहुत सारे लोग ऐसा मानते हैं कि डायरेक्टर के साथ बहुत ज्यादा फ्रेंडली होना ठीक नहीं होता है। एक्टर और कलाकार के बीच एक दूरी होनी चाहिए, मैं इस ख्याल को सिरे से खारिज करता हूं। मेरे पास जब भी किसी फिल्म का ऑफर आता है, तो सबसे पहले मैं यह देखता हूं कि निर्देशक कौन है और मेरा किरदार कैसा है? इसके बाद ही मैं कोई फिल्म साइन करता हूं। हां, कहानी का सवाल जरूर उठता है। मैं अपनी तरह से पूरी कोशिश करता हूं कि कहानी में एक नयापन हो, जो दर्शकों को बोर ना करें। वैसे हिंदी की मसाला फिल्मों में कहानी की गुंजाइश कम ही होती है। फिर मैं अपने आपको अब भी यहां स्टूडेंट मानता हूं। बस, मैं अपनी उपलब्धि यह मानता हूं कि शुरू से ही मैंने ज्यादातर ऐसे किरदार किए, जिसे करने से सभी बचने की कोशिश करते है। अब जैसे कि इन दिनों मैं जो किरदार कर रहा हूं, उनमें से किसी का भी एक-दूसरे से कोई मेल नहीं है। इसीलिए मेरी ऑफ बीट फिल्मों का रिस्पांस भी अच्छा रहा है। ‘माया मेमसाब’, ‘बाजीगर’, ‘कभी हां कभी ना’, ‘डर’, ‘पहेली’ आदि सभी लीक से हटकर फिल्में ही थी।
हीरो भी तो इंसान है
मैंने हीरो के अंदर और ज्यादा कैरेक्टर डालने का प्रयास किया है। इस कैरेक्टर के प्रवेश करने से वह ज्यादा
मानवीय हो जाता है
बहुत सारे लोगों का मानना है कि निगेटिव रोल करना मुझे अच्छा लगता है। असल में पॉजिटिव और निगेटिव दोनों तरह के किरदार करना ही मुझे पसंद है। हिंदी फिल्में हो या दूसरी रीजनल लेंग्वेज की फिल्में, उन सभी के हीरो हीरोइन और विलेन को अभी भी एक दायरे में कैद करके रखा गया है। हीरो व्हाइट, विलेन ब्लैक, हीरोइन और ग्लैमर, वह नाचेगी और गाएगी। इस दृष्टि से मैंने हीरो के अंदर और ज्यादा कैरेक्टर डालने का प्रयास किया है। इस कैरेक्टर के प्रवेश करने से वह ज्यादा मानवीय हो जाता है। ‘डर’ और ‘बाजीगर’ का मेरा रोल कुछ इसी टाइप का था। इनमें नायक का चरित्र काफी सच्चाई के करीब लगता है। मैं इस तरह के रोल को निगिटव नहीं कहता हूं,ये भी मानव समाज के एक चेहरे है। मेरी इस बात को खारिज करने से पहले सिर्फ एक बार जरा सोचिए कि नायक भी तो इंसान है उसके अंदर भी तो मानवीय गुण-अवगुण समाहित होंगे? मैं तो बस एक बात जानता हूं, दर्शकों को नाराज कर आप
ज्यादा दिनों तक टिके नहीं रह सकते। एक्टिंग कैरियर को अपनाने से पहले मैंने यह बात गांठ बांध ली थी कि मुझे हमेशा अपनी क्षमता से ज्यादा अच्छा करना होगा।
हिंदी फिल्मों में विलेन के कुछ खास स्टाइल और चालू डॉयलाग होते हैं। उसके कुछ कॉमन लेंग्वेज और कॉमन डॉयलाग होते हैं। एक्टिंग हमेशा ही मेरी निजी अभिव्यक्ति रही है। मगर यदि दर्शक इसे न कबूल करते, तो किसी भी तरह की सफलता मुझे हासिल नहीं होती। बतौर अभिनेता खुद पर मेरी गहरी आस्था है। एक्टिंग मैं अच्छी कर लेता हूं। इसे मेरा अहंकार मत समझिए।
सत्यजीत रे के अलावा व्यक्तिगत तौर पर राज साहब और हमारे प्रिय मिथुन चक्रवर्ती रूस में आशातीत लोकप्रिय हैं। ‘आवारा’ के बाद जिस तरह से राज कपूर के प्रति रूसी लोगों का पागलपन देखा गया, उसे नए सिरे से बयां करने की जरूरत नहीं है। कुछ इसी तरह से ‘डिस्को डांसर’ मिथुन दा का वहां क्रेज है।
गौरी से वह पहली मुलाकात
जिस तरह मैं चौके-छक्के जड़ रहा था, मैदान के बाहर एक लड़की मेरे हर शॉट पर ताली बजा-बजा कर खड़ी नाच रही थी
एक क्रिकेट मैच के दौरान गौरी से मेरी पहली मुलाकात हुई। क्रिकेट मैं अच्छा ही खेलता हूं और क्रिकेट ने ही मुझे गौरी से मिलने का मौका दिलाया। पुरानी बात है, एक दिन दिल्ली में क्रिकेट का इंटर कॉलेज मैच चल रहा था। मेरे कॉलेज का एक-दूसरे कॉलेज से मैच था। वह टीम काफी मजबूत थी। आगे बढ़ने के लिए यह एक अहम मैच था। विरोधी टीम ने पहले बल्लेबाजी करके अच्छे रन बनाए। गौरी मुझसे भी ज्यादा क्रिकेट की भक्त है। उस दिन भी वह मैच देखने के लिए मैदान में आई थी। विरोधी टीम के रन का पीछा करते हुए बहुत जल्द हमारे तीन अच्छे बल्लेबाज सस्ते में निपट गए। उस समय टेंशन में हमारी हालत खराब हो गई। यह मैच जीतने पर हम सेमी फाइनल में पहुंच जाएंगे। उस समय टेंशन में आकर मैंने अपनी अंगुली के सारे नाखून कुतर डाले थे। मुझे फोर्थ डाउन भेजा गया। जरा-सा सेट होने के बाद मैंने गेंद को पीटना शुरू कर दिया। पीट-पाट कर मैंने अपने कॉलेज केलिए अच्छे रन बना डाले। ऐसी स्थिति आ गई थी कि हम सभी आराम से खेलकर इस मैच को जीत सकते थे। जिस तरह मैं चौके-छक्के जड़ रहा था, मैदान के बाहर एक लड़की मेरे हर शॉट पर ताली बजा-बजा कर खड़ी नाच रही थी। उस लड़की के उत्साह को मैं नजरअंदाज नहीं कर पाया। बैटिंग कर रहा था और मन ही मन यह भी सोच रहा था कि आखिर यह लड़की है कौन? ऐसे में अचानक ध्यान बंटने से एक फुलटॉस बॉल को मारने के चक्कर में बॉल मेरे कंधे में आ लगी। मैं दर्द से बिलबिला उठा। दर्द इस कदर था कि मैं छटपटा कर क्रीज पर ही बैठ गया। दर्द की वजह से आंखों के सामने एक अंधेरा छा गया था। आसपास के लोग धुंधले से दिखाई पड़ने लगे थे। फिर भी ऐसी हालत में मैदान के बाहर की उस लड़की का चमकता चेहरा आंखों के सामने एकदम स्पष्ट नजर आ रहा था। ऐसा लगा नारंगी रंग की सलवार-कमीज पहने हुए व गुस्सेवाला चेहरा लेकर वह लड़की ठीक मेरे सामने आ खड़ी हुई है। इसके बाद का मुझे कुछ याद नहीं, बेहोश हो चुका था। बाद में जब ठीक हुआ तो दोस्तों से जाना की नारंगी रंग की उस लड़की का नाम गौरी है। यह भी सुनने को मिला कि मुझे लेकर गौरी भी अस्पताल आई थी। बहुत देर तक वह वहां बैठी रही। मेरा एक दोस्त गौरी को जानता था। गौरी का पता जानता था। उससे ही गौरी का पता लेकर उसका शुक्रिया अदा करने के लिए उसके घर पहुंच गया। उसने परिवार के लोगों से मेरा परिचय कराया। अस्पताल आने के लिए मैंने उसे धन्यवाद कहा। बातचीत क्रिकेट को लेकर शुरू हुई। मैं उसके क्रिकेट ज्ञान से काफी प्रभावित था। बाद में धीरे-धीरे हमारी यह दोस्ती प्यार में बदल गई। पहले ही बता चुका हूं, हमारी शादी को लेकर कम बवाल नहीं हुए। चूंकि हम दोनों ही अपने-अपने निर्णय पर दृढ़ थे, इसीलिए आज हम सुखी दंपति है। मेरे प्रोफेशन को लेकर मेरी पत्नी और मेरे बीच कोई गलतफहमी नहीं है। लेकिन गौरी का एक ही आदेश है-शूटिंग के बाद दोस्त या चमचों के साथ बेवजह गॉसिप न करके सीधे लोकेशन या स्टूडियो से घर पहुंचो, बीच में यदि कोई जरूरी काम पड़ जाए, तो तुरंत इंफॉर्म करो। बेचारी गौरी, घर में लगभग सारे दिन अकेले रहती है। इसीलिए मेरा घर में रहना उसे बहुत अच्छा लगता है। मेरी तरह गौरी भी घर घुसरु है। मेरी तरह उसे भी घर के बाहर बेवजह मटरगश्ती पसंद नहीं।
राजनीति से तौबा
‘आई हेट पॉलिटिक्स। पॉलिटिक्स इज टू पॉलिटिकल फॉर मी।’ इस राजनीति ने हमें क्या दिया है?
मैं मीडिया के साथ थोड़ा संभल कर चलता हूं। उनसे आमना-सामना होते ही राजनीति से जुड़े उलटे-पुलटे सवाल पूछकर वे मेरे मुंह से कोई जवाब निकालने की कोशिश करते है। मुझसे पूछा जाता है-’मैं राजनीति में जाऊंगा या नहीं, किसके पक्ष में कैंपेन करुंगा आदि।’ सिर्फ मीडिया वालों को ही नहीं मैं सभी से कहना चाहता हूं, यह राजनीति एक ऐसी बात है जिसकी छाया से भी मैं हमेशा दूर रहना चाहता हूं। ‘आई हेट पॉलिटिक्स। पॉलिटिक्स इज टू पॉलिटिकल फॉर मी।’ इस राजनीति ने हमें क्या दिया है? इसके लिए मैं राजनीति को दोषी नहीं मानता हूं, दोषी वह लोग हैं जिनके लिए राजनीति एक व्यवसाय है। इस संदर्भ में अपने एक प्रिय दोस्त संजय दत्त का विशेष जिक्र करना चाहता हूं। मैं उसे बहुत अच्छी तरह से जानता हूं। संजय पूरी तरह से निर्दोष है, ऐसा मैंने कभी नहीं कहा। लेकिन वर्षों उसे जिस तरह से मुकदमेबाजी में फंसा कर रखा गया, उसका कोई अर्थ मैं समझ नहीं पाता हूं। इससे उसका मन, शरीर और अभिनय-जीवन सब कुछ अपसेट हो गया है। उस जैसे इतने बड़े मन के लड़के की क्या यही किस्मत थी। उसकी बातें कभी-कभी सोचकर मन खराब हो जाता है। ऊपर वाले की दया से उसके जीवन में एक स्थिरता और खुशी आई है, वह कायम रहे यही दुआ है। धर्म को जिस तरह से राजनीति के साथ जोड़ा जाता है, उसे देखकर भी मेरा मन कई बार बहुत खिन्न हो जाता है। जो जर्नलिस्ट येलो जर्नलिज्म करते हैं, मुझे लगता है वे कहीं ना कहीं अपने पेशे में बेइमानी का सहारा लेते है। बहुत भरे मन से कहना चाहता हूं कि हमारी इस फिल्म इंडस्ट्री में कोई किसी का दोस्त नहीं है। ऊपरी तौर पर सभी एक-दूसरे को गले लगाते हैं, पर पीठ पीछे एक-दूसरे पर वार करते हैं।
एक्टिंग और डायरेक्शन दोनों एक साथ नहीं
‘आई एम ए वेरी फिजिकल एक्टर। आई बिलिव इन फिजिकल एक्टिंग।’ मैं अभिनय अपने सारे अंगों की मदद से करता हूं
मैं एक अभिनेता हूं, इसीलिए एक्टिंग को लेकर ही ज्यादा बातें कहना या सुनना मुझे पसंद है। एक्टिंग के दौरान मैं सबसे ज्यादा अपनी आंखों का ही इस्तेमाल करता हूं। आंखों के साथ-साथ मेरा पूरा शरीर चलता है। अपने बारे में मुझे ऐसा लगता है कि ‘आई एम ए वेरी फिजिकल एक्टर। आई बिलिव इन फिजिकल एक्टिंग।’ मैं अभिनय अपने सारे अंगों की मदद से करता हूं। पहले पूरी पटकथा को पढ़कर अपने किरदार को अच्छी तरह से समझ लेता हूं। इसके बाद पटकथा से अपने पसंदीदा चार-पांच लाइन लेकर उस पर अपने किरदार को स्थिर करता हूं। और जब मैं एक्टिंग करता हूं, ये लाइनें मुझे हमेशा याद रहती हैं। तब एक्टिंग मेरे भीतर से स्वत:स्फूर्त बाहर आता रहता है। वैसे मैं बहुत इमोशनल और सेंसिटिव हूं। और यही इमोशनल अभिनय के मामले में भी मदद करता है। सेंसिटिव न होने पर झटपट किरदार के भीतर घुसना मुमकिन नहीं होता है। मैं एक नरम दिल इंसान हूं। मगर मेरे सामने यदि कोई झूठ बोलता है या किसी बात को छिपाने की कोशिश करता है, तो मेरा मिजाज तुरंत खराब हो जाता है। शायद यही मेरे खराब स्वभाव में आता है। अचानक गुस्सा होना ठीक बात नहीं है, लेकिन मैं चाहकर भी इसे संभाल नहीं पाता हूं। एक्टिंग के साथ-साथ निर्देशन भी मुझे बहुत अच्छा लगता है। ऊपर वाले ने चाहा तो भविष्य में डायरेक्टर बनने की इच्छा है। यदि कभी एक्टिंग से विमुख हुआ, तो निर्देशन ही करूंगा।
मेरे फुरसत के पल
मैं एमटीवी चाइल्ड नहीं हूं, न ही मुंशी प्रेमचंद चाइल्ड हूं। मैं अमिताभ बच्चन चाइल्ड हूं। मेरी हमउम्र के ज्यादातर लोग ही ऐसे हैं
×ðरे बंगले ‘मन्नत’ में बहुत सारे पेट डॉग्स हैं। मैं इन्हें बहुत प्यार करता हूं। फुरसत मिलने पर घर में गौरी से बातें करता हूं, पेट्स का ख्याल रखता हूं। बच्चों के साथ वीडियो गेम्स खेलता हूं, वीडियो पर फिल्में देखता हूं, अपने पर्सनल कंप्यूटर के साथ थोड़ी छेड़खानी करता हूं। मेरा बंगला मेरे लिए एक मंदिर की तरह है। सारे दिन की व्यस्तता के बाद जब घर पर लौट कर थोड़ा-सा आराम करने के बाद ही शांति से मेरा मन भर उठता है। एक सुखी संसार एक व्यक्ति, खास तौर से एक सृजनशील व्यक्ति के लिए कितना जरूरी है, इसे मैं बहुत अच्छी तरह से समझता हूं। आज मेरी इस सफलता के पीछे निश्चित तौर पर मेरी बीवी गौरी की एक अहम भूमिका है। खैर, मौका लगते ही मैं किताबें खूब पढ़ता हूं। विदेशी साहित्यकारों में रॉबर्ट जौर्डन, रुडाल और डगलस एडमस के लेखन का मैं कायल हूं। रशियन लेखक भी मुझे बहुत पसंद है। रविंद्रनाथ ठाकुर की अनुवादित छोटी कहानियां और कविताएं पढ़ी हैं। शरतचंद्र और मुंशी प्रेमचंद को भी पढ़ा है। ये सभी महान लेखक हैं। मगर इनकी रचनाओं को पूरे सटीक ढंग से ग्रहण करने के लिए जिस मानसिक प्रस्तुति और तर्क की जरूरत पड़ती है, वह हममें से ज्यादा लोगों के पास नहीं है। अब आप मेरी बात ही ले लीजिए, मैं एमटीवी चाइल्ड नहीं हूं, न ही मुंशी प्रेमचंद चाइल्ड हूं। मैं अमिताभ बच्चन चाइल्ड हूं। मेरी हमउम्र के ज्यादातर लोग ही ऐसे हैं। हमें न मुंशी प्रेमचंद पसंद आते हैं, न ही एमटीवी का शोरगुल भरा प्रोग्राम। हमें पसंद हैं जेम्स हेडली चेज। अब जरा आज के बच्चों से पूछिए, वे जेम्स हेडली चेज को पहचानते ही नहीं है। एमटीवी देखने वाले छोटे-छोटे बच्चों की बातें सुनकर मैं कई बार चकित हो जाता हूं। मेरे पिता एक बहुत शिक्षित व्यक्ति थे। देश-विदेश के विख्यात लेखकों की रचनाएं वह पढ़ते थे। बाद में उस कम उम्र में भी वह उसकी चर्चा मुझसे करते थे। मैंने विश्व के महान लेखकों की कहानियां पहली बार पापा से ही सुनी थी। मैंने टॉलस्टाय, मैक्सिम गोर्की, दस्तोवस्की, बर्नार्ड शॉ को यथासंभव पढ़ने की कोशिश की। दस्तोवस्की का ‘इडियट’ पढ़कर मैं इस कदर प्रभावित हुआ था कि मैंने मणि कौल के साथ यह फिल्म की। इस फिल्म को करने में बहुत मजा आया।
संगीत जो मुझे पसंद है
बिली जोएल, माइकल जैक्सन, हार्ट एरा मेरे प्रिय सिंगर हैं। हिंदी फिल्मों के पुराने गाने मुझे पसंद है
çßदेशी साहित्य की तरह मैं विदेशी म्यूजिक का भी जर्बदस्त फैन हूं। शास्त्रीय संगीत मुझे उतना पसंद नहीं है। मुझे उस तरह का गीत-संगीत पसंद है, जो मेरे शरीर को झकझोर दे। जिसकी धुनों पर नाच-नाच कर मैं अपने पैरों को पूरी तरह से थका दूं। बिली जोएल, माइकल जैक्सन, हार्ट एरा मेरे प्रिय सिंगर है। हिंदी फिल्मों के पुराने गाने मुझे पसंद है। आज की कुछेक फिल्मों के गानों पर ही मुझे थिरकना अच्छा लगता है। आज के दौर के पर्ाश्व गायक मेरे लिए आवाज देते हैं, उनके बारे में कोई गलत टिप्पणी सुनना मुझे पसंद नहीं है। कुमार सानू, उदित नारायण, विनोद राठौड़, शान सभी बहुत मेहनत करके आगे बढ़े है। लेकिन मेरे पसंदीदा गायक हमेशा मोहम्मद रफी रहे हैं। फुरसत में किशोर कुमार के गाने सुनना भी मुझे पसंद है। ‘द ग्रेट किशोर कुमार’ णमेरे ऑइडल हैं। इतने गुणी व्यक्ति से मेरी मुलाकात नहीं हो पाई, इस बात का दुख मुझे हमेशा रहेगा। किशोर दा की तरह लता जी की मैं बहुत श्रध्दा करता हूं। वैसे लता मंगेशकर के बारे में कुछ बोलना मैं जरूरी नहीं समझता हूं। हम सभी उनके फैन हैं।
मेरा दयालु मन
जब कोई महिला बाथरूम के अभाव में सड़क के नल में स्नान करने के लिए मजबूर हो जाती है, मेरा मन रो उठता है
जो लोग गरीब है या असहाय हैं जिन्हें मदद की जरूरत है, मैं उनकी बहुत व्यक्तिगत तौर पर मदद करता हूं। पर मैं किसी संगठन या एनजीओ के साथ जुड़ा हुआ नहीं हूं। इसी तरह ‘एंटी ड्रग कैंपेन’ या किसी अन्य अच्छे काम के लिए जब भी मुझे याद किया जाता है, मैं खुशी-खुशी वहां पहुंच जाता हूं। इन सब मामलों में मिथुन चक्रवर्ती हमारी इंडस्ट्री में सबसे आगे हैं। जब भी किसी को किसी सहायता की जरूरत पड़ती है, मिथुन दा वहां हाजिर हो जाते हैं। जब कोई महिला बाथरूम के अभाव में सड़क के नल में स्नान करने के लिए मजबूर हो जाती है, मेरा मन रो उठता है। किसी महिला को फटी हुई साड़ी पहने हुए देखकर भी मेरा मन खराब हो जाता है। आजादी के इतने सालों के बाद भी हम सामान्य जीवनयापन की इतनी व्यवस्था भी आम आदमी के लिए नहीं कर पाए है। यह बहुत ही लज्जास्पद बात है।
मेरे जीवन की अनुप्रेरणा
ईश्वर पर मेरा विश्वास नहीं है। मैं पुनर्जन्म पर भी यकीन नहीं करता हूं
अक्सर मीडिया के लोग मुझसे पूछते हैं, मेरे जीवन की अनुप्रेरणा कौन है? मेरे स्वर्गीय माता-पिता ही हमेशा मेरे अनुप्रेरणा बने रहेंगे पर मेरा कोई आदर्श व्यक्ति नहीं है। मेरे जीवन के दो ही लक्ष्य हैं- पहला, मैं अच्छा अभिनेता बनना चाहता हूं। दूसरा, हर व्यक्ति केमन में मैं एक अच्छे इंसान के तौर पर जीवित रहना चाहता हूं। अपनी सहनशीलता को मैं और आगे बढ़ाना चाहता हूं। कुछ आलोचक मेरी एक्टिंग के बारे में कहते है कभी-कभी उसमें एकढर्रापन और दोहराना झलकता है। मैं इससे इंकार नहीं करता हूं। मेरा ड्रीम रोल क्या है। ईश्वर पर मेरा विश्वास नहीं है। मैं पुनर्जन्म पर भी यकीन नहीं करता हूं। यदि मैं अपने माता-पिता को वापिस ले आ पाता, तो पुनर्जन्म पर मुझे भी यकीन हो जाता। वैसे पुनर्जन्म पर आधारित एक फिल्म ‘करण अर्जुन’ में काम करने में मुझे बहुत मजा आया। मेरे ख्याल से अपने ऊपर यकीन रखना सबसे अच्छी बात है। यह विश्वास और भविष्य की आशा-आकांक्षा ही किसी भी व्यक्ति को जिंदा रहने के लिए बहुत जरूरी होती है। हमारे प्रतिदिन के जीवन में कत्ल, मार-पीट, सांप्रदायिक दंगे, बम विस्फोट, व्याभिचार, बलात्कार आदि की जो घटनाएं हो रही हैं, क्या ये बातें हमारी सामाजिक संरचना के लिए बाधक नहीं हैं। ये सारी घटनाएं ही तो फिल्मों में पेश की जा रही हैं। तब फिल्मों को कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? खैर, जो लोग मुझसे प्यार करते हैं, उनसे मैं सिर्फ एक ही बात कहता हूं, आप सभी सुखी हों। क्योंकि सुखी रहना ही इस पृथ्वी में सबसे दुष्कर बात बन चुकी है और यदि सचमुच सुखी हो जाते है, तो दूसरों से उसका बंटवारा कर लीजिए। इससे आपका सुख और बढ़ जाएगा। अपने सारे प्रशंसकों से सिर्फ एक ही बात कहना चाहता हूं, आप यदि मुझे पसंद करते हैं, तो मेरी फिल्में जरूर देखिए। मेरी एक्टिंग की जम कर पोस्टमार्टम करने के बाद भी मुझसे प्यार जरूर कीजिए। ऊपर वाला आप सबको स्वस्थ मंगल रखे।








