माया गोविंद (कवि-गीतकार)
हिंदी सिनेमा में गीतों का जो दौर था, उसका अकाल पड़ गया है। गीत तो अभी भी लिखे ही जा रहे हैं, लोगों की जुबान पर भी आ रहे हैं लेकिन उसकी उम्र ज्यादा नहीं होती। इसकी वजह जानने की कभी भी हमने गंभीरता से कोशिश नहीं की। मगर मैं एक बात जानती हूं और स्वीकार करती हूं कि समय के बदलने के साथ ही बहुत कुछ बदल जाता है। कहने के अर्थ और अंदाज भी बदल जाते हैं। मां-पिताजी बदले हुए अंदाज में मॉम-पॉप हो सकते हैं लेकिन मां-बाप का जो स्थान, सम्मान है वह कभी नहीं बदलता। यह एक स्थायी भाव है। गीतों से यही स्थायी-भाव चला गया है। ‘मुन्नी बदनाम हुई…’, ‘शीला की जवानी…’ कुछ दिनों तक आपके मनोभाव पर कब्जा कर सकते हैं, राज नहीं कर सकते। राज करता है शब्द, उसकी आंतरिक बुनावट और संवेदनशील भाव। कब्जा करती है रिद्म। अगर यह रिद्म शब्दों के साथ तालमेल करके चलती तो आज के गीत-संगीत भी उतने ही प्रभावी होते जितना 50-60 के दशक के गीत-संगीत असर करते थे। वे आज भी हर जुबान पर इसीलिए हैं कि उसके पीछे काफी मेहनत होती थी। महीनों अभ्यास और रियाज होता था। आज उसका ठीक उल्टा होता है। सिंगर स्टूडियो में आते हैं, उन्हें गीत की लाइनें बता दी जाती हैं, उन्हें टयून सुना दी जाती है और गाने के लिए कह दिया जाता है। उन्हें पता ही नहीं चल पाता है कि किस सिचुएशन का गाना है, फिल्म की कहानी क्या है? इसीलिए जो ‘फील’ उभरना चाहिए, ठीक तरह से नहीं उभर पाता है। इसके बावजूद हालांकि सिंगर अपनी ‘फील’ के हिसाब से गाने की कोशिश करते हैं। उनकी तारीफ होती है।
मैं तो मंच की कवि और गीतकार रही हूं। इसके बावजूद फिल्मों में गाने लिखे। फिल्मों की संख्या लगभग 400 हो गई। इसके अलावा निजी एल्बम तथा सीरियलों में गीत लिखे और लिख भी रही हूं। मेरा सौभाग्य है कि लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, कल्याण जी आनंद जी, खैय्याम आदि महान संगीतकारों के सान्निध्य का मौका मिला। उनके लिए गीत लिखे। ये ऐसे लोग रहे हैं जो शब्दों की ताकत और महत्त्व को जानते थे। शब्द-शक्ति के अनुसार रिद्म तैयार करते थे। किस शब्द और भाव में कौन सा वाद्य यंत्र ठीक रहेगा, इस पर वक्त लगाते थे। जब रियाज होता था तब गीतकार को भी बुलाया जाता था।
मगर आज दुख इस बात का है कि शब्द पीछे रह गए हैं और रिद्म को आगे कर दिया गया है। इस कारण शोर ज्यादा बढ़ गया है, इसमें सुकून नहीं है। आज टयून पहले बनायी जाती है और गीत बाद में बनते हैं। यही वजह है कि दोनों में बेहतर तालमेल नहीं हो पाता है। जिसे हम पोएट्री कहते हैं, वह पीछे-पीछे चलने के लिए बाध्य होती है। इससे कविता-गीत को नुकसान उठाना पड़ा है। कवि-गीतकारों का महत्त्व कम हुआ है। उन गीतकारों का महत्व बढ़ा है जो तुकबंदी कर सकते हैं। इसे आधुनिकीकरण भी कहा जाता है और दलील दी जाती है कि ये गीतकार आधुनिक तकनीक के साथ चल रहे हैं। मेरा मानना है कि तकनीक से किसी का क्या विरोध हो सकता है? लेकिन तकनीक भी अपनी जगह है, उसे वहीं रहने देना चाहिए। अगर अपनी कार को हम गैरेज में ना रखकर बेडरूम में लाकर रखने लगें तो इसे उपयुक्त नहीं कहा जा सकता। आजकल मंदिरों में टेप या सीडी लगा दी जाती हैं और भजन-आरती गूंजने लगते हैं। उसी पर पंडित जी पूजन करते हैं। लेकिन इसमें भक्तों की सहभागिता खत्म हो गई है। भगवान से, भाव से, शब्दों से जुड़ने की जो ललक थी, उसे मशीन निगल गई। बस खानापूर्ति हो रही है।
लोकगीतों का भी यही हाल हुआ है। लोकगीत गांव-समाज में हैं मगर वहां मुन्नी और शीला का विस्तार हो रहा है। मुन्नी…हमारे लोकगीत की ही नकल है,लेकिन पर्दे पर शब्द नकली अंदाज में शोर-शराबे के साथ आया है। लोकगीतों के साथ तो साजिश भी चल रही है। उसे वेस्टनाइज करके हमसे छीनने की कोशिश चल रही है। लोकगीतों को यहां देहाती और उजड्ड गीत करार दिया जाता है लेकिन पश्चिमी धुन में डालकर और उसे आधुनिकता का जामा पहनाकर वे लोग वाहवाही लूटने में व्यस्त हैं। सबसे दुखद बात तो यह है कि ‘फोक गीत’ को आइटम से जोड़ दिया जाता है। यह फोक की ताकत ही है कि आइटम से जुड़ने के बाद भी बाकी सारे गीतों पर वह हावी हो जाता है। हां, कह सकते हैं कि भोजपुरी फिल्मों में ‘फोक’ कुछ हद तक अपने मूल रूप में मौजूद है। फोक गीत हमारे दुख-दर्द, हंसी-खुशी, उत्सव और मस्ती की भाषा है। उसे कभी भी खत्म नहीं किया जा सकता। मगर उस पर जिस तरह के हमले हो रहे हैं और उस पर कब्जा जमाने की कोशिश हो रही है, उससे सावधान रहना चाहिए। ‘फोक’ हमारा चरित्र है, उसे अगर कोई चरित्रहीन और बेशर्म करने की साजिश करता है तो उसका प्रतिरोध किया जाना चाहिए। फोक गीतों की अपनी संगीत और धुन भी है, उसे ‘चोर’ सीधे उठा लिए जा रहे हैं। यह चोरी पूरी तरह से सीना जोरी के साथ हो रही है। लेकिन हम चुप हैं। श्याम बेनेगल के निर्देशन में एक फिल्म बनी थी ‘हरी भरी’, उसमें मैंने एक गीत लिखा था ‘अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ…।’ इसे संगीतबध्द किया था वनराज भाटिया ने। इस गीत की उस समय काफी चर्चा हो गई थी मगर दुर्भाग्यवश फिल्म रिलीज नहीं हो पाई। अगर वह गीत बाहर आता तो अंदाजा लगता कि उस गीत के भाव और शब्द क्या है? मगर वही एक लाइन आज घर-घर तक सीरियल के माध्यम से पहुंच गई है। ऐसी हजारों लाइनें हैं लोकगीतों में, जो गीत-संगीत की दुनिया को समृध्द कर सकती हैं। इसमें संवेदनशील फिल्मकारों, समझदार संगीतकारों-गीतकारों को पहल करनी होगी।
वैसे भी अच्छे गीतों के लिए अच्छी कहानी चाहिए। उस पर पूरी टीम एकजुट होकर लगे। इससे न केवल फिल्में अच्छी बनेंगी, बल्कि आज की पीढ़ी का भी ध्यान आकर्षित करेगी।








