आज नहीं तो कल हम भोजपुरी में फिल्म जरूर बनाएंगे

Posted on 06 फ़रवरी 2011 by admin

सूरज बड़जात्या
मैं बहुत हैरान हूं, यह सोचकर कि भोजपुरी भाषा और संस्कृति अपनी सारी खूबियों के बावजूद फिल्मों के रूप में अपना ऐतिहासिक विस्तार क्यों नहीं कर पा रही है। भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री रुकते-रुकते भी बड़ी हो गई है। इसकी अपनी ताकत हो गई है। दक्षिण को छोड़ दिया जाए तो क्षेत्रीय फिल्मों में इसका नाम तेजी से लिया जा रहा है। मुझे जहां तक लगता है, हिंदी के बाद भोजपुरी ही सबसे ज्यादा बोली जाने वाली बोली है, लेकिन शुरूआती दौर को छोड़ दें तो इस समय भोजपुरी की एकाध फिल्में ही होंगी, जो काफी लोकप्रिय हुई होंगी।
मैं बहुत ईमानदारी से स्वीकार करता हूं कि मैंने अभी तक सिर्फ एक ही भोजपुरी फिल्म देखी है-’ससुरा बड़ा पइसा वाला’, उसके बाद देखने का मौका नहीं मिला। हां, यह भी कह सकते हैं कि देखने की ललक नहीं हुई। मेरे और पिताजी श्री राजकुमार बड़जात्या के साथ हालांकि कई बार भोजपुरी सिनेमा को लेकर बातचीत हुई है। हर बार यह सोचा गया कि अच्छी पारिवारिक भोजपुरी फिल्म बनाई जाए। लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाया क्योंकि मुझे इसके मार्किट की सही-सही जानकारी नहीं है। वितरण को लेकर भी मुझे तरह-तरह की बातें सुनने को मिलती है। हालांकि मेरा मानना है कि अगर अच्छी फिल्म बने तो भोजपुरी दर्शक हर तरह से स्वागत करेंगे। चूंकि ‘नदिया के पार’ इतनी अच्छी बनी मगर पूरे देश में इसका स्वागत नहीं हुआ। इसका राजश्री परिवार को हमेशा मलाल रहा। दक्षिण ने तो पूरी तरह नकार दिया था क्योंकि वहां के दर्शकों को इसके संवाद समझ में ही नहीं आए। लेकिन बाकी हिंदी क्षेत्र में इसे अच्छी सफलता मिली थी। लेकिन कुल मिलाकर कहा जाए तो ‘नदिया के पार’ के साथ न्याय नहीं हुआ था, जबकि यह बहुत अच्छी फिल्म थी। इसके स्क्रिप्ट पर बारह साल तक काम हुआ था। यह फिल्म बन भी इसीलिए गई क्योंकि गोंविद मुनीस जैसी शख्सियत हमारे साथ थे। पिताजी बताते हैं कि उन्होंने कैसे इसे अपने लिए जीवन-मरण का सवाल बना लिया था। इसके बावजूद फिल्म सब जगह नहीं चली तब राजश्री प्रोड्क्शन के जनक ताराचंद बड़जात्या ने फैसला किया कि इसी फिल्म को वे हिंदी में बनाएंगे। जब वह ‘हम आपके हैं कौन’ बनाई तो फिल्म ने अपना ऐतिहासिक रिकार्ड बनाया। इसका मतलब साफ है कि सब्जेक्ट अच्छा था। हिंदी का चूंकि दर्शक वर्ग बहुत बड़ा है इसीलिए हर जगह धमाकेदार अंदाज में यह फिल्म चली।
देखिए क्षेत्रीय फिल्मों की अपनी सीमा है, इसे मेकर को भी स्वीकार करना पड़ेगा। आखिर भोजपुरी फिल्मों के बजट कम होने का कारण भी तो यही है। हिंदी हो या भोजपुरी-मेकिंग में कोई फर्क नहीं होता। सिर्फ एक्टरों के पैसे और लोकेशन का खर्च के फर्क होता है। भोजपुरी में कम बजट होता है इसीलिए मन माफिक बहुत करने में बाधा आ जाती है। आपको आश्चर्य होगा कि ‘नदिया केपार’ का दूसरा पार्ट बनाने के बारे में विचार आया था, लेकिन सिर्फ मन के स्तर पर तैयारी हुई, व्यावहारिक रूप में कुछ कठिनाइयों के कारण यह संभव नहीं हो पाया। वैसे राजश्री की जितनी फिल्में बनीं हैं-उसकी पृष्ठभूमि में ज्यादातर मध्य प्रदेश या फिर राजस्थान रहा है। इसे हर जगह स्वीकारा जाता है-वह चाहे भोजपुर-अवध के क्षेत्र हों या बुंदेलखंड या हरियाणा के। पारिवारिक फिल्मों के साथ यही सबसे बड़ा प्लस है कि वह हर जगह के दर्शकों को अपना परिवार लगता है।
मुझे खुशी होती है कि ‘नदिया के पार’ को लोग भोजपुरी फिल्म मानते हैं, जबकि यह थी अवधी। भोजपुरी हो या अवधी-उसका सीधा संबंध हिंदी से है। गोविंद मुनीस तो यहां तक कहते थे कि ‘क्या’ की जगह ‘का’ और ‘क्यों’ की जगह ‘काहे’ कर देने के अलावा इसमें ज्यादा परिवर्तन नहीं था, व्याकरण और सोच के हिसाब से यह हिंदी है।
भोजपुरी से राजश्री प्रोड्क्शन का इंकार नहीं है। हम लोग पहले इसके बाजार को समझना चाहते हैं। गोविंद मुनीस जैसा साथी चाहते हैं और ‘कोहबर की शर्त’ जैसी कहानी चाहिए। अगर ऐसा संयोग बनता है तो हमें भोजपुरी फिल्म बनाने में खुशी होगी। हां, यह सही है कि राजश्री चूंकि एक नाम है, अगर यह भोजपुरी में हाथ लगाता है तो लोग स्वागत करेंगे। दर्शकों में एक उत्सुकता भी पैदा होगी। संभव है स्वच्छ हवा भी भोजपुरी में चलने लगे। मुझे लगता है कि भोजपुरी फिल्में भी देखनी चाहिए। एक देखने के बाद दूसरी नहीं देखना एक तरह की भूल ही है। हालांकि ‘ससुरा बड़ा पइसा वाला’ देखने के बाद यह अंदाज लगाना सहज हो गया कि भोजपुरी में लाउड फिल्में बनती हैं। हमारी फिल्म इससे अलग होगी। मेरे पिताजी कहते हैं कि ‘नदिया के पार’ का डायलॉग पूरी तरह अवधी थे, जो समझ में आसानी से नहीं आ रहा था, उसे बाद में सहज कराया गया। अगर भोजपुरी बने और वह सहज बोली में हो तो कोई कारण नहीं है कि विशाल भारतीय दर्शक स्वीकार नहीं करें। हमारा इतना ही मानना है कि हम चाहे किसी भी भाषा में फिल्म बनाएं, लेकिन राजश्री के बेस पर ही बनाएंगे। हमने अभी-अभी युवाओं के लिए एक फिल्म बनाई है ‘इसी लाइफ में’, उसमें परंपरा और आधुनिकता का टकराव है मगर उसमें हमारी अच्छी परंपरा और सामाजिकता की डोर कायम है। हमें ध्यान में रखना होगा कि आप फिल्म किसको लेकर बनाना चाहते हैं? स्टार को लेकर या सब्जेक्ट को लेकर। राजश्री सफल इसीलिए हुआ है कि वह सब्जेक्ट पर फिल्म बनाता है। संभव है, आज नहीं तो कल हम भोजपुरी में फिल्म बनाएं-तो वहां भी सब्जेक्ट ही मुख्य रोल में होगा।

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